भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला, जिसने अर्जुन का अहंकार दूर कर दिया

एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वे बहुत बड़े धनुर्धर हैं। भगवान श्रीकृष्ण उनके घोड़ों की देखभाल करते हैं, रथ हाँकते हैं और अपनी बहन सुभद्रा का विवाह भी उनसे कर दिया है।

अर्जुन के मन में यह भाव आने लगा कि वे कोई विशेष व्यक्ति हैं।

भगवान श्रीकृष्ण समझ गए कि अर्जुन के मन में अहंकार ने स्थान बना लिया है। उन्होंने सोचा कि इस अहंकार को दूर करना आवश्यक है।

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को लेकर वन में गए। वहाँ उन्होंने एक विचित्र व्यक्ति को देखा। वह अपने बाएँ हाथ में तलवार लिए हुए था और दाएँ हाथ से सूखे पत्ते खा रहा था।

अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा, “प्रभु! यह व्यक्ति सूखे पत्ते क्यों खा रहा है?”

श्रीकृष्ण ने कहा, “चलो, इनसे ही पूछ लेते हैं।”

अर्जुन उस व्यक्ति के पास गए और बोले, “महाराज! वन में इतने हरे पत्ते हैं, फिर आप सूखे पत्ते क्यों खा रहे हैं?”

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “मैं अपने पेट के लिए किसी जीवित वृक्ष के पत्ते नहीं तोड़ना चाहता। जैसे तुम्हारे शरीर को कष्ट हो, वैसे ही वृक्ष को भी कष्ट होता होगा।”

अर्जुन उसके उत्तर से प्रभावित हुए। फिर उन्होंने पूछा, “महाराज! आप तलवार बाएँ हाथ में क्यों लिए हुए हैं?”

उस व्यक्ति ने कहा, “मुझे तीन व्यक्तियों को दंड देना है। इसलिए तलवार साथ रखता हूँ।”

अर्जुन ने उत्साह से कहा, “महाराज! मैं एक महान धनुर्धर हूँ। आप बताइए, वे कौन हैं?”

उस व्यक्ति ने कहा, “पहला है भृगु ऋषि।”

यह सुनकर अर्जुन चौंक गए। उन्होंने पूछा, “महाराज! भृगु ऋषि से आपको क्या शिकायत है?”

उसने कहा, “उन्होंने मेरे प्रिय श्रीकृष्ण के वक्षस्थल पर लात मारी थी। मैं यह अपमान सहन नहीं कर सकता।”

अर्जुन ने विनम्रता से कहा, “महाराज! भृगु ऋषि महान ब्राह्मण हैं। उनका वध करना मेरे लिए उचित नहीं होगा।”

उस व्यक्ति ने कहा, “अच्छा, तो दूसरी है द्रौपदी। उसने मेरे प्रिय श्रीकृष्ण को जूठा भोजन कराया था।”

यह सुनकर अर्जुन असमंजस में पड़ गए। द्रौपदी उनकी पत्नी थीं। उन्होंने कहा, “महाराज! स्त्री पर शस्त्र उठाना मेरे लिए उचित नहीं है।”

उस व्यक्ति ने कहा, “अच्छा, तीसरे व्यक्ति को तो दंड दे सकोगे?”

अर्जुन ने पूछा, “वह कौन है? वह ब्राह्मण या स्त्री तो नहीं है?”

उसने उत्तर दिया, “वह अर्जुन है!”

यह सुनकर अर्जुन चौंक गए। उन्होंने पूछा, “महाराज! अर्जुन ने आपका क्या बिगाड़ा है?”

उस व्यक्ति ने कहा, “वह मेरे प्रिय श्यामसुंदर से घोड़ों की सेवा करवाता है, उनसे रथ हँकवाता है और अनेक कार्य करवाता है। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि मेरे प्रभु उसकी सेवा करें।”

अब अर्जुन समझ गए कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। यदि वह उनके विषय में इतना कुछ जानता है, तो अवश्य ही कोई विलक्षण महात्मा होगा। अर्जुन ने वहाँ से चलना ही उचित समझा और भगवान श्रीकृष्ण के पास लौट आए।

श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर पूछा, “अर्जुन! क्या हुआ? उन महात्मा से भेंट हुई?”

अर्जुन ने कहा, “प्रभु! आपकी लीला अद्भुत है। अब मैं समझ गया कि मेरे मन में अहंकार आ गया था। आप मुझे यह समझाना चाहते थे कि जिस सेवा को मैं अपना सौभाग्य मानने के बजाय कभी-कभी अपनी महानता समझने लगा था, उसी सेवा को देखकर कोई दूसरा आपके प्रति अपने प्रेम में व्याकुल हो सकता है।”

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उनके अहंकार का बोध करा दिया।

कथा की शिक्षा

अहंकार मनुष्य की बुद्धि को ढक लेता है। जब व्यक्ति अपनी योग्यता, सम्मान और उपलब्धियों को अपनी महानता समझने लगता है, तब वह उस कृपा को भूल जाता है जिसके कारण उसे सब कुछ प्राप्त हुआ है।

सच्ची महानता अहंकार में नहीं, बल्कि विनम्रता और भगवान के प्रति प्रेम में है।
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